
अब की बार मैं
बारिश में भी सूखी रह गयी
तुम्हारा साथ पाने की तमना दिल में रह गयी
याद है मुझे वो बारिश
जब यूं ही भीगने के लिए
हम निकल पड़े थे अजमेर की सडको पर
उस सतरंगी शाम को
हाथ में हाथ लेकर
आसपास की दुनिया को देखते हुए
खूब भीगे थे सावन की फूहारो में
लेकिन आज न तो तुम्हारा साथ है
और न ही हाथो में हाथ
भला मैं कैसे भीगू इस बारिश में
आज फिर बरसा है पानी
उन यादो में फिर फिर लोटते हुए
यह बारिश
मुझे बहुत अकेला और उदास कर रही है
