Saturday, August 28, 2010

अजमेर में बारिश


अब की बार मैं

बारिश में भी सूखी रह गयी

तुम्हारा साथ पाने की तमना दिल में रह गयी

याद है मुझे वो बारिश

जब यूं ही भीगने के लिए

हम निकल पड़े थे अजमेर की सडको पर

उस सतरंगी शाम को

हाथ में हाथ लेकर

आसपास की दुनिया को देखते हुए

खूब भीगे थे सावन की फूहारो में

लेकिन आज न तो तुम्हारा साथ है

और न ही हाथो में हाथ

भला मैं कैसे भीगू इस बारिश में

आज फिर बरसा है पानी

उन यादो में फिर फिर लोटते हुए

यह बारिश

मुझे बहुत अकेला और उदास कर रही है

आंसू


मैं भरता हूँ

आता हूँ और गिर जाता हूँ

कोई मिटा देता है मुझे

हाथ या फिर किसी कपडे से

या फिर खुद ही सूख जाता हूँ

फिर फिर न आने की हिदायत भी देता है कोई मुझे

लेकिन मेरी नियति ही कुछ ऐसी है

आना, भरना , छलकना

मिटा देना या फिर खुद ही मिट जाना

जी हा मैं आंसू हूँ !

Tuesday, August 3, 2010

मेरी बेटी मिष्टी झूले का आनंद लेते हुए