
जिस तरह मयूर
काली घटाओ को देख
कूकने लगते है
प्रेमिका बारिश की फुहारों से
अपने तनमन को भिगोने लगती है
नववधू अपने पति के
जल्द घर लौटने की
राह तकने लगती है
उसी तरह बारिश
धरती की प्यास बुझाने के लिए
खुद को मिटा देती है
और समां जाती है
धरती के गर्भ में
इस उम्मीद से
कि एक बार फिर
बादल उसे
अपनी आगोश में लेगा
और रिमझिम फुहारों के रूप में
धरती पर बरसा देगा
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