भारत-पाक सीमा को देखने से पूर्व मन में एक अलग ही तरह का रोमांच होता है ! जो मेरे मन में भी था! भारत पाक सीमा का नाम लेते ही हमारे दिमाग में तारो से बनाये हुए घेरे या फिर वाघा बॉर्डर पैर तैनात सैनिको की छवि उभरने लगती है ! लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है ! पिछले दिनों मेरा जोधपुर जाना हुआ जहा सड़क मार्ग से होते हुए मैं सूरतगढ़ पहुची ! रास्ते में रेत के ऊँचे ऊँचे टीले जैसे उठ-उठ कर मेरा स्वागत कर रहे थे ! रेत के इन ऊँचे ऊँचे टीलो को मैं साफ़ तोर से देख सकू और दूर तक पसरे संनाटे को सुन सकू इसके लिए मैं ड्राईवर के साथ वाली अगली सीट पर ही बैठ गयी ! हालाकि मेरे दुसरे साथियों ने मुझे कार की पिछली सीट पर बैठने के लिए कई बार जोर दिया, लेकिन रेगिस्तान में पसरी इस ख़ामोशी को सुनने के लिए मैंने अगली सीट पर ही बैठ कर सफ़र तय करने का जैसे दृढ निश्चय कर लिया था !
बहरहाल बात हो रही थी भारत पाक सीमा की ! तो आपको बता दू कि जितनी उत्सुकता भारत पाक सीमा को देखने के लिए मेरे अन्दर थी उस सीमा दृश्य को देखने के बाद मुझे एहसास हुआ कि ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे देखकर यह कहा जा सके कि इस तरफ भारत है और उस तरफ पाकिस्तान ! सिर्फ तारो का एक घेरा यह बता रहा था कि तार के घेरे के इस पार भारत और उस पार पाकिस्तान है ! इसके अलावा चरवाहो के साथ पशु उस तरफ भी चर रहे थे और इस तरफ भी ! रेतीली धरती उस पार भी थी और इस पार भी ! हाथ में बन्दूक लिए सैनिक सीमा की चोकसी उस पार भी कर रहे थे और इस पार भी ! खुले नील गगन में तिरंगा इधर भी लहरा रहा था तो उस तरफ पाकिस्तान का झंडा भी अपनी मोजूदगी बता रहा था !
इस यात्रा के दोरान सूरतगढ़ आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिशासी रविदत मोहता और बतोर उद्घोषक राजेश चडडा से भी मुलाक़ात हुई ! राजेश चडडा का आकशवाणी से मिटटी की सुगंध नामक एक कार्यक्रम प्रसारित होता है ! अब आप सोच रहे होंगे कि भारत पाक सीमा की बात करते हुए मैं आकशवाणी के कार्यक्रम में कहा चली गयी ! तो आपको बताना चाहती हूँ कि सूरतगढ़ आकशवाणी से प्रसारित इस कार्यक्रम के तमाम श्रोता सीमा पार भी बसे है ! जो कार्यक्रम सुनने के बाद ना सिर्फ राजेश जी को फ़ोन करके बधाई देते है बल्कि अपनी फरमाइश भी जाहिर करते रहते है ! दिलचस्प बात यह है की सीमा पार बसे इन संगीत प्रेमियों की फरमाइश पूरी करने की राजेश जी हर संभव कोशिश करते है! यह बात यहाँ इसलिए बतानी जरुरी समझी क्योकि तारो से बना एक घेरा सिर्फ इंसानों को ही रोक सकता है ! पंछियों, नदियों, पवन के झोको को नहीं ! और न ही संगीत की बेताब करती धुनों के प्रेमियों को ! कहना होगा कि प्रकृति की तरफ से कोई सीमा निर्धारित नहीं की गयी है बल्कि लोंगो ने ही सीमाओ का निर्धारण अपने निजी स्वार्थ के चलते कर दिए है !
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Very nice composition. bahut bahut dhayawaad aapo
ReplyDeleteNature always gives equal opportunities to human being to realize/access the benefits of its SPECTRUM