Thursday, May 20, 2010

सिर्फ तुम्हारे लिए, तुम्हारे साथ


जब पहली बार मैं

तुम्हारे साथ चली थी गीली रेत पर

मेरी आँखों के सामने था

अथाह समुद्र और उफनती हुई लहेरे

उस पल मिल गया था मुझे सब कुछ और

सिमट गई थी मेरी जिंदगी तुम्हारे इर्दगिर्द

एक बार फिर चलना चाहती हूँ

मैं उसी गीली रेत पर तुम्हारे साथ

और महसुस करना चाहती हूँ तुम्हारी छुअन के स्पर्श को

देखना चाहती हूँ मेरे चहेरे की ख़ुशी तुम्हारे चहेरे पर

कि कितनी खुश हूँ मैं

Tuesday, March 9, 2010

महिला आरक्षण क्यों ?

महिला आरक्षण क्यों ?
आज सुबह जब मैं एक बस मैं सफ़र कर रही थी तो थोडा आगे जाने पर एक स्टैंड से इक बीमार औरत बस में छड़ी
उसकी उम्र कोई ५० या ५५ रही होगी शरीरसे तो वह ठीक ठाक दिख रही थी लेकिन थी वो बीमार ही उसको देखकर ऐसा लग रहा था कि वो अभी अभी किसी बड़े सदमे से गुजरी है उसके सर के बाल मुंडे हुए बाल बता रहे थे कि हाल ही में वो विधवा हुई है उसके वैव्धे कि पीड़ा उसके चेहरे पर साफ़ देखि जा सकती थी उस औरत कि सूरत और बीमार हालत को देखते हुए कंडक्टर ने अगली सीट पर ही बटेएक युवा लड़के से कहा इस महिला को सीट दे दो कान में हेड फ़ोन लगाए गाना सुनते हुए इस नवयुवक ने पहेल तो कंडक्टर कि बात सुनी ही नहीं जब उसने फिर कहा तो कानो से हेअत फ़ोन कि तार निकलता हुआ बोला कि यह तो लडिस सीट नहीं है कंडक्टर ने कहा कि यह तो में जानता हु लेकिन यह महिला बीमार है उसने कंडक्टर कि बातो को अनसुना करते हुए कानो में एक बार फिर हेड फ़ोन तारे ठुस्ता हुआ गाने सुनने में मस्त हो गया वहबीमार औरत कड़ी रही कंडक्टर के बगल में खड़ी मैं यह सब देख रही थी मैंने कंडक्टर सीट पर अपना भरी भरकम बैग रखा हुआ था उसे उठाते हुए मैंने उस पीड़ित महिला को भेटने लिए कहा खेर उस पीड़ित महिला को तो सीट मिल गयी लेकिन मेरे दिमाग मैं कई सवाल झनझना रहे थे और कंडक्टर भी बडबडा रहा था यह है आज का युवा जो किसी बीमार औरत का भी लिहाज़ नहीं करता मैं भी मन में कई सवालो के साथ आगे बढगयी और अगले स्टैंड पर उतरने कि तयारी करने लगी यह घटना ८ मार्च २०१० कि है जिसे पूरा संसार विश्व महिला दिवस के रूप में मनाता है और इसी दिन संसद में महिलाओ को ३३ प्रतिशत आरक्षण दिय जाने भेष भी चल रही थी बात यहाँ यह उटती है कि हमारे देश का यूथ आज जब बीमार और उम्रदराज़ औरत औरत को कुछ देर के लिए भेटने के लिए सीट नहीं दे सकता तो संसद में ३३ प्रतिशत आरक्षण देकर क्या होगा ?
बात सिर्फ यही ख़तम नहीं हो जाती मैं पूछना छाती हूँ कि संसद में महिलाओ को आरक्षण मिल भी जाये तो उससे क्या होने वाला है संसद में महिलाओ को आरक्षण देने से पहेल जरूरत है कि आज कि युवा पीड़ी के मन में महिलाओ के प्रति आदर भाव पैदा किया जाये
सवाल यह भी है कि आज हमारे युवा अपनी संस्कृति और तहज़ीब भूल गए है वे भूल गए है कि कभी इस बस में उनकी माँ बेहें भी सफ़र करती होंगी उनके साथ कोई ऐसा व्यावार करेगा तो उनको कैसा लगेगा ?

Thursday, August 27, 2009

मौन


कविता
आशा मोहिनी
मौन बोलता है खामोशी सुनती है
भावनाए बिन पंख उड़ती है
सोचो गर लग जाए मुझको पंख तो
बन जाऊ में भी नील गगन का हिस्सा
और उड़ जाऊ दूर चंद्रमा के पास
बचपन की उस कहानी को सच करने
जो दादी नानी सुनाती थी
कि दूर गगन से आती है कोई परी
और देती है हजारो खुशिया
गर यह सच है तो क्यो है
हमारे यहाँ बचपन इतना उदास