
उस दिन तुमने और मैंने
पहली बार देखी थी बर्फ गिरते हुए
रुई के फाहे भर लेना चहाती थी मैं अपनी मुट्टी में
मैं समेट लेना चहाती थी इन लम्हों को
हमेशा के लिए अपने दामन में
और तुम मेरी ख़ुशी को
अपनी बाहों में भर लेना चहाते थे
चहाते थे तुम कि मैं पहेली स्त्री बनू
जो इन बर्फ रुपी फाहों पर
तुमसे भी पहेले चलू
तुम्हारी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए
तुम्हारा हाथ छोड़ कर मैं चल पड़ी थी
प्रकीती के इस अद्भुत नज़ारे पर
लेकिन एक बार फिर मैं जीना चाह्ह्ती हूँ
उस पल को
तुम्हारा हाथ थम कर चलना
चहाती हूँ उन रुई के फाहों पर
हमें मालूम नहीं था, क़ि आप इतना अच्छा लिखती हो...बहुत बढ़िया.
ReplyDeleteबहुत खुब
ReplyDeleteआप तो महान लेखिका है
ReplyDeleteहमारी शुभकामना आप के लिए