Sunday, June 13, 2010

यादो के झरोके


उस दिन तुमने और मैंने

पहली बार देखी थी बर्फ गिरते हुए

रुई के फाहे भर लेना चहाती थी मैं अपनी मुट्टी में

मैं समेट लेना चहाती थी इन लम्हों को

हमेशा के लिए अपने दामन में

और तुम मेरी ख़ुशी को

अपनी बाहों में भर लेना चहाते थे

चहाते थे तुम कि मैं पहेली स्त्री बनू

जो इन बर्फ रुपी फाहों पर

तुमसे भी पहेले चलू

तुम्हारी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए

तुम्हारा हाथ छोड़ कर मैं चल पड़ी थी

प्रकीती के इस अद्भुत नज़ारे पर

लेकिन एक बार फिर मैं जीना चाह्ह्ती हूँ

उस पल को

तुम्हारा हाथ थम कर चलना

चहाती हूँ उन रुई के फाहों पर

3 comments:

  1. हमें मालूम नहीं था, क़ि आप इतना अच्छा लिखती हो...बहुत बढ़िया.

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  2. आप तो महान लेखिका है
    हमारी शुभकामना आप के लिए

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