
जिंदगी के कागज़ बिखरे पड़े है
सोचती हूँ जब भी इन्हें ठीक करने की
तो कोई हवा का झोका आकर
इन सूखे पत्तो को
बिखरा देता है
फिर असहाय सी मैं
एकटक देखती रहती हूँ
उन बिखरे मुरझाये पत्तो को
जिनका अब कोई वजूद नहीं
लेकिन जब इनमे रंग था
उत्साह था और जीने की ललक थी
तब किसी ने डाल से तोड़कर
कुचल दिया इन्हें
मिटा दिए इनके सारे अरमान
और इस तरह मेरी
जिंदगी एक सूखा पत्ता बन गयी
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