Saturday, November 27, 2010

माँ

यू चले जाना तुम्हारा असमय
मुझे तन्हा कर कर गया
उठा जब मेरे सर से पिता का साया
तो उस दिन मैं अनाथ हुई थी
लेकिन आज तुम्हारा यू चले जाना
मुझे अकेला कर गया

Saturday, November 20, 2010

फिर उन्ही राहों पर


न हम मिले न तुम मिले
फिर भी है मिले मिले
न तुमने देखा न हमने देखा
फिर भी लगते है जाने पहचाने
न तुम्हारा पता न मेरा
फिर भी हम दोनों का एक ठिकाना
कुछ तो रज़ा होगी इसमें खुदा की
जो हम तुम मिले कुछ ऐसे
जैसे सीप में मोती, दिए की ज्योति
चाँद की चांदनी, राग की रागिनी
इधर क्या कभी तुमने
अपने दिल की धड़कन को सुना है
कि तुम्हारा दिल मेरे लिए
और मेरा दिल तुम्हारे लिए धडकता है
मैं होती हूँ तुम्हारे गम से विचलित
और मेरा दर्द तुमको खलता है
मेरी ख़ुशी में तुम हँसते हो
तुम्हारी ख़ुशी से मैं खुश होती हूँ
कभी सोचा है तुमने ऐसा क्यों है
क्यों रहता है
हम दोनों को एक दूजे का इंतज़ार
ये क्या है, ये क्यों है न तुम जानो न हम
लेकिन फिर भी हम दोनों है
एक दूजे के लिए
एक दूजे के मन में
शायद कभी हम न मिले
लेकिन फिर भी जिस तरह
हम रोज़ रात को मिलते है कुछ ऐसे
जैसे कभी जुदा ही नहीं थे
तुम मुझमे और मैं तुम में समां जाती हूँ
और एक सपनीली दुनिया में खो जाते है हम दोनों
कब तक चलेगा ये सिलसिला
न तुम जानो न हम
लेकिन प्रार्थना है ये ऊपर वाले से
हम कभी न मिलते हुए हमेशा मिले रहे
और एक दूजे में यु ही खोए रहे

Friday, November 19, 2010

एक शहर शमशान


लाशो का शहर निराला होता है
भरी भीड़ हर कोई वह अकेला होता है
शमशान है जीवन का अंतिम पड़ाव
बावजूद उसके उस शहर से
लोगो का फासला गहरा होता है
जलती है एक साथ कई चिताए
लेकिन फिर भी
वहा हर कोई अकेला होता है
पहुच गए हम भी एक दिन जीते जी
लाशो के उस शहर में
और महसूस किया
कि यही है जीवन का अंतिम सत्य
इसका न कोई दूसरा हवाला होता है
लाशो का शहर निराला होता है
भरी भीड़ में हर कोई वहा अकेला होता है

मैं जिंदा रहूंगी


मैं जानती हूँ मेरे मरने के बाद भी
तुम मुझे मरने नहीं दोगे
मुझे जिंदा रखोगे हमेशा हमेशा
मैं यह भी जानती हूँ
मेरे मरने के बाद
मेरी तस्वीर पर तुम माला भी नहीं चडाओगे
क्योकि माला तो
मरे हुए लोगो कि तस्वीरो पर चड़ाई जाती है
मैं तो जिंदा रहूंगी
तुम्हारी यादो में, तुम्हारी सासों में, तुम्हारी जिंदगी में
तुम तो मुझे जीवन पर्यंत जिंदा रखोगे
फिर भला मेरी तस्वीर
माला की हक़दार कैसे हो सकती है
लेकिन अफ़सोस
मैं तुमको जिंदा नहीं रख पाऊँगी
क्योकि मैं तुमसे पहेले ही चली जाऊंगी
वहा उस दुनिया में
और उस लोक में
तुम्हारा इंतज़ार करूंगी
ठीक वैसे ही
जैसे इस जन्म में जीते जी करती रही

जिंदगी


रोज़ नयी पहेली सी मेरे सामने आती है तू
ऐ जिंदगी इतने गम कहा से लाती है तू
कभी किसी को हसाती कभी किसी को रूलाती है तू
ऐ जिंदगी इतनी चालबाजिया कहा से सीख जाती है तू
कभी किसी को मिलाती कभी किसी को बिछोड्ती है तू
ऐ जिंदगी इतनी लुकाछिपी कैसे खेल जाती है तू
ये बता दे हमे ऐ जिंदगी
सबको रोज़ एक नया रूप दिखलाती है तू
ऐ जिंदगी इतनी रंगिनिया कहा से लाती है तू
और क्या है तेरे दामन में छिपा
ऐ जिंदगी आज ये बता दे तू
एक छोटे से जीवन में
कितना कुछ दिखा देती है तू
रोज़ नयी पहेली सी मेरे सामने आती है तू
ऐ जिंदगी इतने गम कहा से लाती है तू

Thursday, November 18, 2010

स्पर्श कि मादकता


आज तुमने जब मुझे छुआ
तो मुझे कुछ न हुआ
आज तुम्हारे स्पर्श में वो मादकता नहीं थी
जो पहेले हुआ करती थी
आज तुम्हारे छुने से मेरे रोए खड़े नहीं हुए
आज तुम्हारे छूने से मेरा दिल धक् धक् नहीं किया
न ही तुम्हारे स्पर्श से मेरी आँखे बंद हुई
मेरे जिस्म पर रेंगती तुम्हारी अंगुलिया ऐसी प्रतीत होती है
जैसे मेरे जिस्म पर साँप रेंग रहे हो
लगता है तुम्हारी तरह बदल गए तुम्हारे एहसास भी
और तुम्हारी छुअन कि मादकता भी घुल गयी
किसी और कि चाहत में

Saturday, August 28, 2010

अजमेर में बारिश


अब की बार मैं

बारिश में भी सूखी रह गयी

तुम्हारा साथ पाने की तमना दिल में रह गयी

याद है मुझे वो बारिश

जब यूं ही भीगने के लिए

हम निकल पड़े थे अजमेर की सडको पर

उस सतरंगी शाम को

हाथ में हाथ लेकर

आसपास की दुनिया को देखते हुए

खूब भीगे थे सावन की फूहारो में

लेकिन आज न तो तुम्हारा साथ है

और न ही हाथो में हाथ

भला मैं कैसे भीगू इस बारिश में

आज फिर बरसा है पानी

उन यादो में फिर फिर लोटते हुए

यह बारिश

मुझे बहुत अकेला और उदास कर रही है