Tuesday, January 3, 2012

प्रेम


प्रेम में आप जितना भी दे
आप फिर भी महसूस करते है
कि आपने पर्याप्त नहीं दिया
आप मानते है,
कि जो आपने दिया है वेह थोड़ा है !
यदि आप महसूस करते है
कि आपने बहुत दिया है तो
उसका मतलब
प्रेम में कुछ न कुछ कमी रह गयी है

Monday, August 1, 2011

कब्र में जीते लोग


क्या कभी किसी ने सोचा है
कब्र की भी एक दुनिया होती है
कब्र में भी कुछ ज़िन्दगिया
बरसो तक इंतज़ार करती है
किसी एक का
और कई-कई वर्षो तक
निरंतर जीती रहती है
ये ज़िन्दगिया इस आस में
कि एक दिन कोई आएगा
उनकी कब्र पर एक दिया जलाने
और रोशन कर जाएगा
उनकी सूनी और वीरान जिंदगी को
उसी तरह मैं भी
शरीर रूपी कब्र में
जी रही हूँ न जाने कब से
कि कभी तो आएगा वो
जो मुझे शरीर रुपी कब्र से
मुक्ति दिलाएगा और अपनी
प्यार भरी बाहों  की आगोश में
चैन की नींद सुलाएगा,  चैन की नींद सुलाएगा  चैन की नींद सुलाएगा

Tuesday, June 14, 2011

मेरा जीवन


जब भी मैं
रेलवे स्टेशन जाती
ठहर जाती
रेल की पटरियों
पर मेरी नज़र
ये पटरियां
दो बिछुड़े हुए को मिलाती
मुसाफिरों को भी
एक जगह से दूसरी जगह पहुचाती
लेकिन खुद कभी नहीं मिलती
कुछ ऐसा ही है
मेरा जीवन
हम साथ तो चलते है
पर कभी मिलते नहीं !

उसी तरह


जिस तरह मयूर
काली घटाओ को देख
कूकने लगते है
प्रेमिका बारिश की फुहारों से
अपने तनमन को भिगोने लगती है
नववधू अपने पति के
जल्द घर लौटने की
राह तकने लगती है
उसी तरह बारिश
धरती की प्यास बुझाने के लिए
खुद को मिटा देती है
और समां जाती है
धरती के गर्भ में
इस उम्मीद से
कि एक बार फिर
बादल उसे
अपनी आगोश में लेगा
और रिमझिम फुहारों के रूप में
धरती पर बरसा देगा

रिश्ते


मेरी आँखों में आंसू है
मगर आंसू ख़ुशी के है
खुद को खोकर तुझको पाया
ये रिश्ते जिंदगी है
हमे यूँ न भूल सकोगे तुम
जा भी न सकोगे यूँ हमसे दूर तुम
पता नहीं तुझको हमदम मेरे
वक़्त के इन फासलों से
दिल और भी करीब होता है

मेरी तन्हाई


जब कोई नहीं होता साथ मेरे
वो मेरे साथ होती है
सिसकती खामोश रातो में
मुझे ढडांस बंधा जाती है
दिल कि गेहरइयो में
बना ली है जगह उसने
जीवन भर साथ निभाने कि कसमे भी खाई है
जी हाँ वो और कोई नहीं
सिर्फ तुम, सिर्फ तुम, सिर्फ तुम हो
मेरी तन्हाई

Wednesday, March 2, 2011

पत्ता बनती जिंदगी


जिंदगी के कागज़ बिखरे पड़े है
सोचती हूँ जब भी इन्हें ठीक करने की
तो कोई हवा का झोका आकर
इन सूखे पत्तो को
बिखरा देता है
फिर असहाय सी मैं
एकटक देखती रहती हूँ
उन बिखरे मुरझाये पत्तो को
जिनका अब कोई वजूद नहीं
लेकिन जब इनमे रंग था
उत्साह था और जीने की ललक थी
तब किसी ने डाल से तोड़कर
कुचल दिया इन्हें
मिटा दिए इनके सारे अरमान
और इस तरह मेरी
जिंदगी एक सूखा पत्ता बन गयी